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अनगिनत लम्हें

अनगिनत लम्हें है इंतज़ार में बीत गए लम्हे  वो जो बीत गए नए लम्हों को नए ढंग  से जीना बासी हो चुके वो जो लम्हे उन्हें न छूना मचले का दिल उन लम्हों को दोहराने को फर्क क्या रह जायेगा फिर , रुक सा जायेगा जैसे चलता हुआ मुसाफिर न बदलेगा समां , न लम्हों को जीने का ढंग खुशियां भी गणित सी मालूम होने लगेंगी दो दूनी चार के  हिसाब सी हो जाएँगी रहने दो खुशियों  को अनन्त सी बेहिसाब ही अनगिनत  लम्हे है इंतज़ार में नए लम्हों को नए ढंग से जीना ही है सही

हमारी लाडली

जश्न की गठरी अपने नन्हे हाथो में मेरे आँगन  की रौशनी अपनी किलकारियों में समेटे जब तू आई  - नमन हुआ मैं उस क्षण से कहता रहा , कहता हूँ हर बार तू है हमारी लाडली , हमारी लाडली लाई बहार न जाने जग को क्यों तुझ में अँधेरा दिखे  मेरे लिए तू इस जग का  रोशन सवेरा संग लाई अपनी कहानी कुछ यूँ लिखेगी अपने भैय्या को पीछे छोड़ देगी वो भी गर्व से कह उठेगा ,जो लड़ता था तुझ से हर  बार  तू है हमारी लाडली , हमारी लाडली लाई बहार मेरी बेटी बनकर ,रिश्तों में रंग भर कर तूने समझया- तू न  हो तो माँ न हो, ये जग न हो  तुने वो शक्ति है पाई - नमन हुआ मैं   उस क्षण से कहता रहा , कहता हूँ हर बार तू है हमारी लाडली , हमारी लाडली लाई बहार 

salaam-e-shukran

ज़िन्दगी  बीत जाती है ज़िन्दगी को  समझने में रह जाती है यादें अगर जी  हो ये ज़िन्दगी हमने  वक़्त के साथियों  को देखो ज़रा  रात की करवट  सुबह  लाती है  बरसात की फुहार बहार  लाती है   और हम वही उलझे रह जाते - कुछ  गिलो कुछ  शिकवों  को दिल से  लगाए  न कभी करवट लेते  रात की तरह ,न बहते बारिश की  तरह  आज  कुछ ऐसा करें की खुद की धड़कने  मुस्कुरा उठे  गिलों  शिकवो के जालों को साफ करें, सालम-ए -शुक्रन से सबको  माफ़ करें 

मन की गठरी

मन की गठरी लिए साँझ सवेरे कल कई बातें यादें संग लिये इक्कठा की है कुछ बातें कुछ दिलासे कुछ डर की गांठे कुछ उम्मीदों के धागे सब बंद है इस मन की गठरी में सोचा है , हवाएँ रुके तो खोलूंगा इसे वरना सब बह जाएगा सुकून रह जायेगा  पर वो सुकून भरी रात से भाग रहा बेवजह ये गठरी को लाद रहा इक्कठा कर मुस्कुराहटें मीठी यादें न डर की गांठे नअ दिलासे

परछाई

पानी में परछाई भी अजीब थी धुंदली सी थी मगर  सच्चाई के कुछ करीब थी वो पानी छलका तो मानो , दिल हल्का हो गया छलकी सी आँखों को सहारा मिल गया और बह गए सारे पल ,अब बस एक हलकी सी मुस्कराहट बाकी है परछाई अभी भी धुंदली सी है मगर कुछ साफ़ है - शायद दिल का वो कोना क्यूंकि रंग बदले नहीं आस्मां अभी भी नीला है हवा छु कर  गुज़रे तो गुदगुदी अभी भी करती पर फिर भी नई सी लग रही थी ज़िन्दगी पानी मैं वो परछाई अजीब थी धुंदली  सी थी  मगर  कुछ सच्चाई के करीब थी #water #heart #786snehil #honesttoyourself 

खता ना थी

यारों के संग चलते हुए न जाने कब वो मोड़ आ गए  कुछ यार आगे बड़  चले , कुछ मुड़  गए , कुछ ठहर गए ,  उस मोड़ की खता ना  थी  ज़िन्दगी ने तो दिए यार , चाहते थी  सबकी अलग , सो बिछड़ गए  इस ज़िन्दगी की भी खता ना  थी  बिखरे है हम यूँ मोतियों की तरह ,   बिखर कर बस रहे एक ही सागर में वो सागर यूँ विशाल , उस सागर की खता ना  थी  मिलें पाये हम किसी शहर , किसी लहर - है अब यही दुआ है  हो जाता दिल उदास कभी कभी उनकी याद में  , उस दिल की खता न थी  

Corrupt Ho gaye

जन्म  से हम यूँ  न थे उम्र  के साथ corrupt होते जा रहे हम चहक न पारहे थे उस बचपन  की तरह  हम , उन्ही बचपन के रिश्तों के संग शायद रिश्तों  के रंग गहरे होते जा रहे और गहराई इतनी  कि वो रिश्ते खोते जा रहे डूब रहे वो रिश्ते एक नई ज़मीन कि खोज में पर मैं  मासूम हूँ , जान बूझ कर एहसास हुआ जन्म  से यूँ न  थे उम्र  के साथ corrupt होते जा रहे हम।