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wo 30 din wahi

मैं हूँ यही पर अब आस्मां वो नहीं कैलेंडर के वो ३०  दिन वही पर ऋतू  है नई ज़िन्दगी जो जी थी यादें बन गई पर कैलेंडर के वो ३०  दिन वही आजकल बस इतवार को फुर्सत रहती है बाकी वारों में खुद को संवारते थोड़े पैसे कमाते कैलेंडर की ओर देख के मुस्कुराते और कहते हम है यही पर अब वो समां नहीं कैलेंडर के वो ३० दिन वही , पर ऋतू है नई वो दिन जब दिन गिनना आदत न थी खुली फिजाओं सा बहना एक  राहत थी  होती थी दिन दोपहरी शाम बेहिसाब मस्तियाँ  ज़िन्दगी जो जी अब वो यादें बन गई कैलेंडर के वो ३०  दिन वही,पर ऋतू है नई

lamhe

रात के वो लम्हे आज भी याद है जब चाँद को भी होश न था बेखबर था सारा आस्मां बेखबर थी हर धड़कन यूँही किनारों पे बैठे  रात ढल गई लहरों से लहरें मिल गई हम दो दिल बेखबर थे तारों की चादर ओढ़े एक हुए जा रहे थे एक दूजे में घुलते जा रहे दो दिल आज भी याद है वो फिजाओं का यूँ छु के गुज़रना सारे ख्यालों को संग बहा ले जाना हम दो दिल बेखबर थे एक अलग आस्मां बुन रहे थे बिना कुछ कहे एक दूजे को सून रहे थे ख्वाबों को नहीं अपनी मोहब्बत को जी रहे थे रात के वो लम्हे आज भी याद है साथ बीताये वो लम्हे आज भी याद है

aankhen

राज़-ऐ-दिल है कई इन आँखों के शीशों को छुपालू कहीं बयां कर देते वो हर बात... जिसके लिए जुबान ने किया था इंकार बेहिसाब एहसासों को समेट कर एक दिल बना कर रखा है सिने में कुछ  एहसास ख़ुशी के...कुछ गम के.. और कुछ राज़  बन कर ठहर गए इस दिल  में.. पर ये आँखें न सम्भलें,बयां करे राज़-ऐ-दिल कई.... काश  इन आँखों के शीशों को छुपालू कहीं ज़िन्दगी कुछ कहानियाँ बुन रही थी.. हर लम्हे  के लिए एक नया रंग चुन रही थी... उन लाखों रंगों की ख्वाहिश  को समेट कर एक दिल बना कर रखा है सिने में  कुछ रंग रंगीले से...कुछ फीके से रह रहे थे इस दिल में.. पर ये आँखें न  सम्भलें,छलका दे हर वो रंग.... काश इन आँखों के शीशों को छुपालू कहीं.... संग मेरे मेरा सनम भी था... वो रंग वो एहसास सारे देख रहा रंगीले से रंग और खुशियों के एहसास को वो भी जी रहा.. पर उन फीके रंगों के लिए... फिजाओं में उसकी फ़िक्र बहने लगी... इसी बहाने नज़दीकियाँ  बढ़ने  लगी...इश्क बढ़ने लगा... आँखों के शीशों को  छुपाने ...