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मन की गठरी

मन की गठरी लिए साँझ सवेरे कल कई बातें यादें संग लिये इक्कठा की है कुछ बातें कुछ दिलासे कुछ डर की गांठे कुछ उम्मीदों के धागे सब बंद है इस मन की गठरी में सोचा है , हवाएँ रुके तो खोलूंगा इसे वरना सब बह जाएगा सुकून रह जायेगा  पर वो सुकून भरी रात से भाग रहा बेवजह ये गठरी को लाद रहा इक्कठा कर मुस्कुराहटें मीठी यादें न डर की गांठे नअ दिलासे

Khushiyon ki zameen

खुशियों की न ज़मीन होती  न आसमान होने को एक पल में  हवा हो जाती रहने को संग सदियाँ बिता देती खुशियों की न ज़मीन होती न आसमान बस इस दिल से निकलती इस दिल से होती ये जवान गहरे सागर से मोती चुन लो या बारिश के बसरते  पानी से ओले हर दिल अपनी ख़ुशी चुनता है बेफिक्र के गुब्बारों से हवाओं में उड़ता है न ज़मीन देखता न असमान बस यूँ ही खुशियों से भरी ज़िन्दगी जीने की चाहत करता है और वो ये जनता है खुशियों की न ज़मीन होती न असमान बस इस दिल से निकलती इस दिल से ही होती ये जवान