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खता ना थी

यारों के संग चलते हुए न जाने कब वो मोड़ आ गए  कुछ यार आगे बड़  चले , कुछ मुड़  गए , कुछ ठहर गए ,  उस मोड़ की खता ना  थी  ज़िन्दगी ने तो दिए यार , चाहते थी  सबकी अलग , सो बिछड़ गए  इस ज़िन्दगी की भी खता ना  थी  बिखरे है हम यूँ मोतियों की तरह ,   बिखर कर बस रहे एक ही सागर में वो सागर यूँ विशाल , उस सागर की खता ना  थी  मिलें पाये हम किसी शहर , किसी लहर - है अब यही दुआ है  हो जाता दिल उदास कभी कभी उनकी याद में  , उस दिल की खता न थी  

wo 30 din wahi

मैं हूँ यही पर अब आस्मां वो नहीं कैलेंडर के वो ३०  दिन वही पर ऋतू  है नई ज़िन्दगी जो जी थी यादें बन गई पर कैलेंडर के वो ३०  दिन वही आजकल बस इतवार को फुर्सत रहती है बाकी वारों में खुद को संवारते थोड़े पैसे कमाते कैलेंडर की ओर देख के मुस्कुराते और कहते हम है यही पर अब वो समां नहीं कैलेंडर के वो ३० दिन वही , पर ऋतू है नई वो दिन जब दिन गिनना आदत न थी खुली फिजाओं सा बहना एक  राहत थी  होती थी दिन दोपहरी शाम बेहिसाब मस्तियाँ  ज़िन्दगी जो जी अब वो यादें बन गई कैलेंडर के वो ३०  दिन वही,पर ऋतू है नई