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ज़िन्दगी से मिला हूँ आज अपनी

मिला हूँ आज अपनी ज़िन्दगी से संग हज़ार बातें मिल गई। चाँद सज गया रात सज गई, पर न जाने रात की अंगड़ाई कब टूट गई ज़िन्दगी न जाने कब हमसे रूठ गई। और सारे चमकीले पल तारो से सुबह के आस्मां में - सफ़ेद सागर में  डूब गए पर ज़िन्दगी को जानना अभी बाकी है हज़ारों बातें अभी बाकी है बातों बातों में बताया इस ज़िन्दगी ने - रूठी नहीं हूँ बस थोड़ी सी जुदा हूँ तुमसे तारो को डूबा दिया कह रहे सूरज को जगा  दिया न देख रहे तब लगा ज़िन्दगी को  जानना अभी बाकी है हज़ारों  बातें  अभी बाकी है !!!

तनहाई

चलते चलते जहाँ  ये बदल गया ज़मीन थी  खाई बन  गई, महफिलें तनहाई बन गई। पर अभी भी धड़कने चल रही, अकेले में  ही सिसक रही और ढून्ढ रही एक किनारा एक पल जिन्दगी से भरा। रोशनी चमक रही थी  चारों तरफ , चेहरे  भी न देख पा रहा था। ऑंखें बंद कर लूँ तो अपने भगवान को भी ना याद कर पा  रहा था। कैसा ये तनहाई का शहर ! चलते चलते ये शहर बदल गया , तनहाई आदतों  में  बदल  गई बेचैनियाँ नशे में बदल गई।   आज भी वही दिल हुँ पर तनहाई के रेगिस्तान में खोया एक किनारा मिल जाये सारे रंग फिर से बदल जाए।।

काश

माँ की कोख से निकलते ही लाल लहू से लिप्त, मेरे नंगे बदन को  हॉस्पिटल की नर्स से श्वेत कपडे से लपेटा और मेरी  माँ की गोद में रख दिया। मेरे नंगे बदन को पहला रिश्ता मिला -  नर्स  का दिया हुआ वो पहला श्वेत कपडा।समय के साथ  कपडे  के रंग  बदले , रिश्ते जुड़ते गए और खुशियाँ बढती गई। किसे पता था की उन कपड़ो के  धागे  मुझे बांध रहे थे।हर धागे से एक रिश्ता बंधता जा रहा था और आज जब मेरी साँसे थक चुकी है, हर रिश्ता - हर धागा मुझे जाने से रोक रहा।आसूँ  भी इन  धागों को-जो दिख तो नहीं  रहे पर  मुझ से बंधे है- तोड़ न पा रहे। काश बिना रिश्तों के जैसे आये थे वैसे ही जा सकते।काश जैसे आते हुए सिर्फ  मैं रोया था जाते वक़्त भी सिर्फ मैं ही रोऊँ। काश ये बिछडन  का दर्द सिर्फ मुझे हो, मेरे कमाए हुए रिश्तों और उनसे जुड़े लोगो का न हो।

मैं कौन हूँ ??

मैं कौन हूँ दिलों के किनारों पे रहता भावनाओं के सागर में बहता हूँ  सागर हूँ या रेत हूँ मैं कौन हूँ ?? ज़मीन से उठ कर,तारो में  रहने को बेताब रहता हवाओं में  घुलने को बेताब रहता मैं कौन हूँ?? जिंदा हूँ कहते कुछ लोग इंसान हूँ कहते बाकी खोज रहा हूँ खुद को जवाब भी खुद को ही दूँ दर्पण में  दिख रही छाया हूँ या अपनी छाया का  दर्पण - अपना कर्म हूँ मैं कौन हूँ ?? असमान की चादर सा विशाल हूँ मौसम की चाल सा बेईमान हूँ या अपने ही दिल में  एक अभिमान हूँ मैं कौन हूँ ?? मैं कौन हूँ ??

मैं ये करूँगा वो करूँगा

मैं ये करूँगा वो करूँगा हवाओं को मोडूँगा असमान  को तोडूंगा टूटेगा बादल, बिखरेगी  बरखा तब ही तो मानेगा जश्न जश्न की जान बनूँगा, मैं ये करूँगा वो करूँगा।। दीवारों पे तारीखें लिख लिख के गिनी है खाली बस्ता तैयार रखा है सारे अरमानों को पूरा करूँगा सुनाई दे रही वो सिक्कों की खनक आये नहीं जेबों में जो अब तक पर फिर भी सोचा है वो करूँगा ये करूँगा।। दो पैसे कम तो  करो पूरी रात खरीदूँगा संग होंगे सब, संग होगा मेरा रब तब ही तो मानेगा जश्न जश्न की जान बनूँगा मैं ये करूँगा वो करूँगा।।

मन की गठरी

मन की  गठरी लिए साँझ  सवेरे कल की बातें यादें संग लिए इक्कठा की  है कुछ बातें कुछ  दिलासे कुछ डर की गाँठे ,कुछ  उम्मीदों के धागे सब  बंद है इस मन की गठरी में हवाएं रुके तो  खोलूँगा सोचा है वरना सब बह जायेगा सुकून रह जयेगा पर वो सुकून भरी रात से भाग रहा बेवजह ये गठरी को लाद रहा इक्कठा कर मुस्कुराहटें , मीठी यादें न डर की गाँठे न दिलासे खोलेगा जब जब ये गठरी मेहेकी मुस्कुराहटें हवाएँ चलेंगी फैलेंगी मुस्कुराहटें चल पड़ेगा फिर से तू बादलों के शहर की डगर पर मिलेंगे फिर कहीं किसी मोड़ पर नए दिलासे नया डर मत घबराना तू  ,मासूम सा मन  है माटी  का तू तेरा तन  है मत घबराना तू  , मासूम सा ये मन है।

Dekhi hai kya !!

ppl get fascinated to glitz n glamour of metro cities brands showrooms n some could handle it some dont some achieve their dreams midst such distraction some find love pateners (another distraction ) some could balance between personal n professional some find a way of escapism for their failure......and saga continues....!!!! देखी है क्या ! चाँद तारों की चमकती सी बरात, देखो  जैसे लग रही हो कोई रात एक गली थी,  दो कदम के फासले चाँद दूल्हा बना  चमक रहा था, मेरा ख्वाब लिए चमक रहा  था चल पड़े चाँद को जेब में भरने दो कदम  से लग  रहे थे  ये रौशनी के झरने देखी  है क्या ! चाँद तारों की चमकती सी बारात देखी  है क्या ! अपने ही सपनो की परछाई ज़िन्दगी थी जो कभी, संग थी जो अभी अभी सपने खो गए परछाई भी, ये गलियाँ\निगल रही तूझे भी\ दो कदम से लग रहे थे जो ये रौशनी के झरने देखी  है क्या !इनमें अपने ही  सपनो की परछाई देखी  है क्या ! अपने ख्वाबो को जाती डगर देखा था जो चौराहे पे खड़े हो कर एक ...