1 बड़ो के आदर में हाथ जोड़ना , नमन करना 2 छोटों को स्नेह कर उनके साथ मुस्कुराना 3 बिना किसी भेद भाव के हर किसी के साथ मिलना ,ही परम आचार - शिष्टाचार है। 4 अपनी वाणी को हमेशा निर्मल रखना 5 सत्य वचन से कभी न मुह मोड़ना 6 अपनी सोच को प्रेम से बताना क्रोध न करना , ही परम आचार - शिष्टाचार है। 7 प्रकृति की रक्षा करना 8. पशु पक्षियों को आज़ाद ही रहने देना 9. अपने मित्रों को भी प्रेरित करना की प्रकृति की रक्षा करें , ही परम आचार -शिष्टाचार है। 10 समय पर अपना कार्य पूरा करना 11 दिनचर्या को समयानुसार संचालित करना 12 पढाई खेल-कूद (क्रीड़ा) कला सबको समय देना सबमें मेहनत करना , ही परम आचार -शिष्टचार है 13 कुछ नियम सिख लिए , कुछ नियम सिख रहा और सारे नियम सीखना है मुझे 14 खुद पर लागू कर आगे बढ़ना है मुझे 15 निरंतर प्रयास मुझे करते रहना है क्य...
बेरंग पत्तों की आहट सुनी सुनी सी लग रही थी वो टूट कर बिखर रहे थे शाखाओं से गिर के उड़ रहे थे ठोकर लगी ,होश संभाला तो पाया वो वो पत्ते मेरी ज़िन्दगी के आयेने है जो टूट कर बिखर रही थी..... फ़र्क सिर्फ इनता था मेरी ज़िन्दगी में जान बाकि थी और उन पत्तों में जूनून मुरझाये तो भी आंसू नहीं , मौसम की छाया में फिर खिलने की चाह नई मांग लूँ उधार ये फितूर फिर हो मुश्किलें चाहे बेहिसाब पिघल जाएगी हर मुश्किल जल उठेगी अगर वो जूनून की आग !!!!! असमान की कोशिश थी सागर को नीले नकाब से वो ढँक दे पर सागर की कोशिश थी की वो नकाबों में न ढले... ठोकर लगी होश समभाला तो पाया सागर की मुश्किलें मेरी ज़िन्दगी से कम न थी .... फर्क सिर्फ इतना था मेरी ज़िन्दगी हार मान चुकी थी..और सागर की कोशिशो का अंत न था... लहरों में खुद को बाँट कर..किनारों तक आने की कोशिश वो करता रहा... सदियाँ बिता दे...उस नीले नकाब को उतारने की कोशिश में....पर न थकत...
* खुदा के दीदार कि दुआ माँगी थी और शायद खुदा ने मोहब्बत कि शक़्ल ओढ़ ली। * तेरे हाँ के इंतज़ार में तुझ से मोहब्बत बढ़ती गई जब जब खुद को रोकना चाहा , धड़कने न जाने क्यूँ डरती रही और तेरे हाँ के इंतज़ार में ये मोहब्ब्त बढ़ती गई। * तेरी हाँ के बाद , अब ज़िन्दगी जन्नत लगने लगी , मोहब्बत के रंग में जो रमने लगी। * छत पर बैठ सारी रात तेरे संग लम्हों को सजाया है सूरज की चादर तले ,इस जहाँ कि नज़रों से छुपाया है * वक़्त की रेत बेफिक्री से फिसलने लगी मौसम बदलने लगे , मोहब्बत बदलने लगी। * दो पल कि ख़ामोशी हज़ारों एहसास बयान कर गई बदलते रिश्तों कि गूँज सुना गई।
Comments
Post a Comment